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‘मोदी मॉडल’ ने बदली देश की तस्वीर

मई, 2023 में मोदी सरकार के नौ साल पूरे हो गए हैं। एक तरफ सरकार ने आर्थिक कानूनों को पारदर्शी व सुगम बनाने की दिशा में गत नौ वर्षों में सफलता अर्जित की, वहीं दूसरी तरफ कल्याणकारी राज्य के रूप में लोकहित के ऐसे निर्णय भी लिए, जिनका जनता के हितों से प्रत्यक्ष सरोकार था। एकतरफ देश को आर्थिक मोर्चे पर कानूनी जटिलताओं से निकालने की दिशा में कानूनी सुधार करते हुए सरकार ने कदम बढाए तो दूसरी तरफ जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, सौभाग्य योजना, आवासीय योजना, स्वच्छता मिशन के तहत शौचालय एवं आयुष्मान योजना जैसे लोकहित के निर्णय लिए हैं। 

देश की आजादी के बाद समाजवादी नीतियों की डगर पर चलते हुए कल्याणकारी राज्य की जिस अवधारणा का विकास हुआ, उसमें सरकारी योजनाओं में ‘लोकहित’ की बजाय ‘लोकलुभावन’ की नीति को ज्यादा तरजीह दी गयी। समाज की यह सामान्य मनोस्थिति है कि वह अपने दूरगामी हितों की बजाय तात्कालिक एवं आकर्षक दिखने वाली नीतियों के प्रति ज्यादा झुकाव रखता है। चुनावी राजनीति का बुनियादी सच यह है कि इसके हितधारक राजनीतिक दलों की प्राथमिकता ‘री-इलेक्ट’ होने अर्थात चुनाव में जीतकर आने की होती है। यहीं से ‘लोक-लुभावन’ शब्द की प्रासंगिकता बढ़ने लगती है। मोदी मॉडल ने इस धारणा को बदला है। 

अगर याद करें तो सितंबर 2014 में जापान की यात्रा पर गये मोदी ने वहां निवेशकों के साथ एक कार्यक्रम में कहा था कि भारत में ‘रेड-टैप नहीं, रेड-कारपेट है।’ रेड-टैप को रेड-कारपेट में बदलने का कार्य मोदी के विजन में प्राथमिकता पर रहा होगा, तभी उन्होंने पद संभालने के महज चार महीने बाद विदेशी मंचों से यह कहना शुरू कर दिया था। हालांकि, यह बदलाव कर पाना कोई चुटकियों का काम नहीं था। कानूनी सुधारों को अमली जामा पहनाने में कठिनाइयाँ थीं। लेकिन यह भी उतना सच है कि चाहें कड़वी दवा पिलानी पड़ी हो या लोकप्रियता के खोने का खतरा मोलना पड़ा हो, मोदी ने अपने दृष्टिकोण से समझौता नहीं किया। ऐसा करना उन्हें एक साहसी नेतृत्वकर्ता के रूप स्थापित करता है।

अपने पहले कार्यकाल के दौरान 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने विमुद्रीकरण का ऐलान किया। विमुद्रीकरण के लगभग आठ महीने बाद एक जुलाई 2017 में मोदी सरकार ने अप्रत्यक्ष करों के सुधार की दिशा में ‘एक राष्ट्र एक कर’ के रूप में जीएसटी लागू कराने में सफलता हासिल की। जीएसटी को इसलिए भी सफल मानना चाहिए कि साल-दर-साल जीएसटी के तहत कर-संग्रह में बढ़ोतरी दर्ज हुई है। अप्रैल, 2023 में 1.87 लाख करोड़ जीएसटी कर-संग्रह रहा है। मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल के शुरूआती वर्षों में ही इन्सोल्वेंसी एंड बैंकरप्सी तथा भगौड़ा आर्थिक अपराध विधेयक पारित किया। ये सारे निर्णय यथास्थितिवाद से टकराने वाले निर्णय थे लेकिन सरकार ने इन निर्णयों को अमली जामा पहनायासरकार ने यह बात जनता को समझाने में कामयाबी हासिल की है कि उनके कार्यकाल में कोई भी उद्योगपति गलत ढंग से कर्ज नहीं लिया है तथा जिन्होंने पिछले यूपीए सरकार में कर्ज लेकर वापस नहीं किया, वे मोदी सरकार में खुद को भारत में सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे थे, लिहाजा उन्हें देश छोड़ना पड़ा।

हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी की मंशा इतने तक रूकने की नहीं थी, वे और आगे जाने का मन बनाकर आये थे। जनवरी 2018 में विश्व आर्थिक मंच को संबोधित करते हुए मोदी कहते हैं कि हम लायसेंस-परमिट राज को जड़ से उखाड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं। भारत में निवेश को सुगम बनाने के लिए हम लगतार कार्य कर रहे हैं। 

अपने कार्यकाल के बेहद शुरूआती दौर में मोदी सरकार द्वारा उठाये गये क़दमों तथा सरकार द्वारा किये गए कानूनी सुधारों का असर साफ़ तौर नजर आ रहा है। कारोबार में सुगमता की दृष्टि से भारत ने चमत्कारिक लक्ष्यों को छुआ है। वर्ष 2014 में ‘ईज ऑफ़ डूइंग बिजनेस’ की रैंकिंग में भारत 142वें पायदान पर था, जो अब 63वें पायदान पर पहुँच चुका है। रैंकिंग में दिख रहा यह सुधार कोई आकस्मात हुआ परिवर्तन नहीं है बल्कि यह सुनियोजित प्रणाली के तहत उठाये गए क़दमों का परिणाम है। भारत दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। 

दरअसल मोदी के इस दृष्टिकोण का आर्थिक पहलू तो परिणामों में नजर आ रहा है लेकिन इसका व्यवहारिक पहलू थोड़ा अलग है। जब परम्परागत रूप से कोई स्थिति एक ढर्रे पर चली आ रही होती है तो सामान्यतया ‘जोखिम’ की तरफ जाना कोई नहीं चाहता। मोदी ने वो जोखिम लिया है। लेकिन इससे बड़ी बात यह है कि उनके जोखिम लेने के बावजूद लोकप्रियता की कसौटी पर उन्हें कोई नुकसान होता नहीं दिखा। चुनाव-दर-चुनाव उनकी लोकप्रियता और जनसमर्थन में बढ़ोतरी ही हुई है। 2019 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी 2014 से भी बड़े जनादेश के साथ जीतकर आये। अनेक राज्य के चुनावों में भी प्रधानमंत्री मोदी का असर खूब दिखा है। 

इसके पीछे बड़ा कारण यह है कि मोदी लोकहित बनाम लोकप्रिय के नीति-निर्धारण में संतुलन स्थापित करने में सफल हुए हैं। साथ ही कड़े फैसले लेते समय लोगों के मन में यह भरोसा पैदा करने में भी उन्होंने सफलता हासिल की है, कि वे जो भी कर रहे हैं इसके दूरगामी परिणाम लोकहित में हैं। दरअसल मोदी की इस सफलता के पीछे एक बड़ा कारण यह नजर आता है कि वे कोई भी कार्य ऐसा नहीं करते जिसका विजन और ब्लू-प्रिंट उनके मन में पहले से तैयार न हो। वे जानते थे कि आर्थिक सुधारों की कठिनाइयों से जनता को दो-चार होना पड़ेगा। इसलिए विमुद्रीकरण जैसा कड़ा फैसला उन्होंने तब लिया जब देश के 25 करोड़ से ज्यादा लोगों को जनधन योजना के माध्यम से बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ चुके थे। 

जनधन योजना से जो शुरुआत प्रधानमंत्री मोदी ने की थी, वह आज भारत में पारदर्शी शासन का एक मॉडल बन रहा है। जनधन-आधार-मोबाइल की तिकड़ी ने डीबीटी के माध्यम से लाभार्थियों को उनका लाभांश सीधे उनके बैंक खाते में पहुंचाने का व्यवस्थित और रिसावमुक्त तंत्र दिया है। सरकार और लाभार्थी के बीच अब बिचौलियों के लिए कोई जगह नहीं बची है। आज देश में 11 करोड़ से अधिक किसानों को हर तीन महीने पर किसान सम्मान निधि बिना किसी अवरोध के पहुँच रही है। सब्सिडी आदि की राशि भी लोगों के बैंक खातों में बिना अवरोध के पहुँच रही है। अमृतकाल का भारत यह भरोसा करता है कि ऊपर से अगर 1 रूपया चलेगा तो नीचे भी 1 रूपया पहुंचेगा। बीच में कोई भी 85 पैसा नहीं हड़प सकता। 

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल की तुलना में दूसरे कार्यकाल में उपलब्धियां और चुनौतियाँ दोनों उल्लेखनीय हैं। इस दौरान कोविड जैसी वैश्विक महामारी की त्रासद भरी चुनौती से भारत मजबूती से लड़ा है। लॉक डाउन से लगाये स्वास्थ्य संरचना तक की चुनौतियों का डटकर सामना किया। कोविड के कठिन दौर में सरकार ने त्वरित और दूरगामी, दोनों तरफ कदम बढ़ाए। गरीबों को राशन दिया तो वहीँ स्वास्थ्य ढाँचे को रिकॉर्ड समय में सुदृढ़ किया। टेस्टिंग किट से लगाये वैक्सीन तक निर्माण करने में आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की। कोविड संकट का मुकाबला जिस तरह से मोदी सरकार ने किया, वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति न सिर्फ भारतियों के मानस पर बल्कि वैश्विक नजरिये पर भी असर डालने वाला रहा है। 

मोदी सरकार ने गरीब कल्याण के लिए जो संकल्प तय किये थे, उनपर काफी काम किये हैं। उज्ज्वला योजना के माध्यम से मोदी सरकार ने उन करोड़ों घरों में रसोई गैस पहुंचाने का कार्य किया, जिनके लिए यह एक सपना था। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 2022 तक सभी को पक्का मकान देने का जो लक्ष्य सरकार ने रखा था, वह अब उन गरीब बस्तियों में नजर आने लगा है जहाँ कुछ समय पहले तक झोपड़ियाँ नजर आती थीं। हर गाँव बिजली के बाद हर घर बिजली पहुंचाने की योजना चलाई तो इसे मुकाम तक पहुंचाया भी। विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट के अनुसार गरीबी कम करने के मामले में भी मोदी सरकार कामयाब होती दिख रही  है। मोदी सरकार द्वारा आयुष्मान भारत के नाम से शुरू स्वास्थ्य योजना के तहत लाभार्थियों के आ रहे आंकड़े मोदी की विश्वसनीयता पर मुहर लगाने वाले हैं। 

ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि नरेंद्र मोदी के नौ साल के कार्यकाल में नीतियों के बीच विरोधाभास नहीं है बल्कि सभी नीतियां परस्पर पूरक की तरह देश के विकास में कारगर साबित हो रही हैं। अमृतकाल के भारत में ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ की कहानी बीती बात हो चुकी है। अब देश नीति, निर्णय, नेतृत्व और नीयत हर मोर्चे पर आगे बढ़ने के लिए तैयार है। 

लेखक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर रिसर्च फैलो हैं।